ये है राजस्थान के 5 बड़े जाट नेता, कौन है सबसे पहला नाम

राजस्थान की राजनीति में आजादी के बाद से ही जाटों का दबदबा रहा है. जाट राजस्थान की सबसे बड़ी कौम है और ये एक किसान जाति है. हालांकि हैरानी ये भी है जाट राजस्थान ( Rajasthan ) में सरकार बनाने और गिराने में तो अहम भूमिका निभाते है. लेकिन आज तक राजस्थान ( Rajasthan ) में कोई जाट मुख्यमंत्री नहीं बन पाया. साल 1977, 1998 और 2008 में तीन बार मौका जरूर आया लेकिन बन नहीं पाए. 1998 और 2008 में तो सियासत के जादूगर कहने जाने वाले अशोक गहलोत ही बाजी मार गए.

आजादी के आंदोलन में किसान कौम ने रजवाड़ों के खिलाफ आंदोलन किया था. लिहाजा आजादी के बाद जाटों जैसी किसानों कौम का लगाव कांग्रेस से बढ़ा. तो वहीं राजपूत जैसी दूसरी जातियां गैर कांग्रेसी पार्टियों के पाले में गई. देश के पहले चुनाव में जोधपुर महाराजा हनवंत सिंह ने कांग्रेस के खिलाफ पूरे मारवाड़ में अपने उम्मीदवार उतारे. खुद जसवंत सिंह जोधपुर से मैदान में उतरे. इसके लिए उन्हैं पंडित जवाहरलाल नेहरू की धमकी का भी सामना करना पड़ा. लेकिन वे मैदान से नहीं हटे. वे चुनाव तो जीते लेकिन चुनाव परिणाम से पहले विमान क्रैश में उनकी और पत्नी की मौत हो गई.

2003 में जाट राजनीति को मिली नई दिशा

1998 तक ऐसा ही चलता रहा लेकिन उसके बाद जाट कौम ने रूख बदला. 2003 में बीजेपी का साथ दिया. 2008 में फिर से कांग्रेस का रूख किया. 2013 के चुनाव में बीजेपी के साथ रही. तो वहीं 2018 में कांग्रेस और बीजेपी के अलावा राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को भी वोट मिले.

जाट कौम ये जरूर चाहती है कि उसकी जाति का कोई प्रदेश स्तर पर नेता बने. लेकिन ऐसा नेतृत्व कोई भी पार्टी दे नहीं पाई. हालांकि इसी बीच वसुंधरा राजे दो बार सीएम ( Rajasthan chief minister ) बनी. वो राजपूर परिवार से थी. लेकिन जाट परिवार में विवाह हुआ था. लिहाजा वो अपने आप को जाट परिवार की बहु मानती थी. यही वजह है कि वक्त वक्त पर जाट वसुंधरा राजे का समर्थन करते रहे है. एक दौर में नागौर का मिर्धा परिवार और झुंझुनूं का ओला परिवार, जोधपुर का मेदरणा परिवार राजस्थान ( Rajasthan ) की जाट राजनीति के केंद्र हुआ करते थे. लेकिन अब इन परिवारों का असर बेहद कम हो गया है.

वर्तमान समय में जहां बीजेपी प्रदेशाध्यक्ष ( Rajasthan bjp ) सतीश पूनिया जाट है, कैबिनेट मंत्री कैलाश चौधरी जाट है. तो वहीं आरएलपी प्रमुख हनुमान बेनीवाल जाट है. मतलब जाट नेतृत्व अब बिखरा हुआ है. सभी पार्टियों में जाट नेता है. तो आज हम आपको प्रदेश के 10 बड़े जाट नेताओं के बारे में बताते है

दसवां नाम- रीटा चौधरी

रीटा चौधरी झुंझुनूं की मंडावा सीट से विधायक है. वो दूसरी बार विधायक बनी है. वो कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रामनारायण चौधरी की बेटी है. रामनारायण चौधरी मंडावा से 7 बार विधायक रहे थे. रीटा चौधरी 2008 से 2013 तक भी मंडावा विधायक रही थी. 2008 में रीटा ने उन्हीं नरेंद्र खीचड़ को हराया था वर्तमान में झुंझुनूं से बीजेपी के विधायक है.

नौवां नाम- ज्योति मिर्धा


नागौर से 2009 में लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंची. नागौर से ही उनके दादा नाथूराम मिर्धा पांच बार सांसद रहे. ज्योति मिर्धा डॉक्टरी का पेशा छोड़कर राजनीति में आई. 2014 के चुनाव में हारने के बाद राजनीति फीकी पड़ने लगी. 2014 में बीजेपी के सीआर चौधरी से हारी. 2019 के चुनाव में भी कांग्रेस ने मैदान में उतारा लेकिन वो हनुमान बेनीवाल ( Hanuman Beniwal ) से हार गई. किसी दौर में राजस्थान ( Rajasthan ) की जाट राजनीति का केंद्र हुआ करता था नागौर का मिर्धा परिवार. लेकिन अब ये राजनीति फीकी पड़ रही है. पार्टी भी ज्यादा तवज्जो नहीं दे रही. 2018 में ज्योति मिर्धा डीडवाना सीट से रामकरण पायली को टिकट दिलाना चाहती थी लेकिन पार्टी ने बात नहीं मानी. विधानसभा चुनाव में रिछपाल मिर्धा, हरेंद्र मिर्धा ने टिकट मांगा लेकिन पार्टी ने नहीं दिया. हालांकि विजय मिर्धा को डेगाना से जरूर उम्मीदवार बनाया.

आठवां नाम- दिव्या मदेरणा


25 अक्तूबर 1984 को जन्मी दिव्या मदेरणा ( divya maderna ) राजस्थान विधानसभा ( Assembly ) की तेज तर्रार विधायक है. वो पूर्व कैबिनेट मंत्री परसराम मदेरणा की पोती और पूर्व मंत्री महिपाल मेदरणा की बेटी है. दिव्या मदेरणा वर्तमान में जोधपुर के औसियां से विधायक है. मदेरणा परिवार 1952 से ही प्रदेश की राजनीति में सक्रिय है. परसराम मदेऱणा 1952 में सरपंच बने. 1957 में ओसियां से विधायक बने और राज्य सरकार में मंत्री बने. वे लगातार चुनाव जीते. 1985 में पहली बार हारे. 1989 में भोपालगढ़ से विधानसभा अध्यक्ष बने. और प्रदेश कांग्रेस ( congress ) अध्यक्ष बने. 1993 में प्रदेश में भैरोसिंह शेखावत की सरकार बनी तो परसराम मदेरणा विपक्ष के नेता बने. 1998 में परसराम मदेरणा मुख्यमंत्री बनने वाले थे. लेकिन अशोक गहलोत ( Ashok gehlot ) ने बाजी मार ली और मदेरणा को विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया.

सातवां नाम- कर्नल सोनाराम चौधरी

आर्मी से राजनीति में आए सोनाराम ने 1971 के भारत पाक युद्ध में भाग लिया था. वे बाड़मेर ( barmer ) से तीन बार लगातार लोकसभा चुनाव भी जीते है. पहला चुनाव 1996 में बीजेपी के जोगराज सिंह को हराकर जीता. 1998 के लोकसभा के चुनाव में बीजेपी के लोकेंद्र सिंह कालवी को चुनाव हराया. 1999 में तीसरी बार बीजेपी के मानवेंद्र सिंह को चुनाव हराकर जीता. हालांकि 2004 के चुनाव में बेहद करीबी अंतर से चुनाव हार गए. उन्हौने फौज में रहते हुए स्थानीय युवाओं को खूब रोजगार दिलाया. वे हमेशा जाट हितों की बात करते है. पश्चिमी राजस्थान की जाट राजनीति में उनका दबदबा है.

छठा नाम- विश्वेंद्र सिंह


23 जून 1962 को जन्मे विश्वेंद्र भरतपुर समेत पूर्वी राजस्थान ( Rajasthan ) की जाट राजनीति का बड़ा नाम है. विश्वेंद्र सिंह गहलोत सरकार में पर्यटन और देवस्थान विभाग के मंत्री है. और वे डीग कुम्हेर विधानसभा सीट से विधायक है. भरतपुर ( bharatpur ) महाराजा बृजेंद्र सिंह के बेटे है. और भरतपुर से लोकसभा सांसद भी रह चुके है. 2019 में गुर्जर आंदोलन की आग को बुझाने में उन्हौने बड़ा रोल निभाया था. विश्वेंद्र सिंह बेहद ही दबंग स्वभाव के है. वे जो बात कहते है साफ और खुलेआम कहते है. किसी के दबाव में नहीं रहते है.

पांचवा नाम- हरीश चौधरी


हरीश चौधऱी कांग्रेस के अंदर पश्चिमी राजस्थान की राजनीति का बड़ा नाम है. हरीश चौधरी वर्तमान में बाड़मेर ( barmer ) के बायतु से विधायक है. और अशोक गहलोत सरकार में राजस्व मंत्री है. वे कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव रह चुके है. और बाड़मेर जैसलमेर संसदीय क्षेत्र से सांसद भी रहे है. इसके अलावा कांग्रेस पार्टी में संगठन स्तर पर भी कई जिम्मेदारियां संभाल चुके है.

चौथा नाम- रामेश्वर डूडी

बीकानेर की नोखा सीट से पूर्व विधायक रामेश्वर डूडी का नाम जाट राजनीति में बड़ा नाम है. वे 2013 में मोदी लहर के बावजूद नोखा से 32 हजार वोटों से जीते थे. हालांकि 2018 के चुनाव में कांग्रेस के नेताओं ने ही उन्हैं चुनाव हरा दिया. साल 2013 से 2018 तक रामेश्वर डूडी ( rameshwar dudi ) राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर रहे. 2019 में हुए आरसीए चुनावों में भी डूडी ने ताल ठोकी लेकिन वैभव गहलोत और सीपी जोशी ( CP joshi ) गुट के सियासी दांवपेंच के आगे वे हार गए. अब कांग्रेस के भीतर बैठे कुछ नेता इस जाट नेता को कमजोर करने पर तुले है.

तीसरा नाम- सतीश पूनिया

सतीश पूनिया बीजेपी के वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष है. वे जयपुर ( jaipur ) के आमेर से bjp के विधायक है. मुख्य विपक्षी पार्टी के नेता होने के नाते प्रदेश जाट राजनीति में उनका ऊंचा नाम है. पूनिया बीजेपी युवा मोर्चा के प्रदेश ( BJYM ) अध्यक्ष भी रह चुके है. साल 2000 में उन्हौने चूरू के सादुलपुर से चुनाव लड़ा. साल 2013 में आमेर से चुनाव लड़े लेकिन जीते नहीं. 2018 के विधानसभा चुनाव में आमेर से जीत हासिल की. पूनिया में संगठन निर्माण का कौशल है. राजस्थान बीजेपी के सदस्यता अभियान का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया. पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व के भरोसेमंद है.

दूसरा नाम- कैलाश चौधरी

मोदी सरकार में कृषि राज्य मंत्री कैलाश चौधरी ( Kailash Choudhary ) की पश्चिम राजस्थान ( Rajasthan ) के जाटों के साथ साथ किसान वर्ग में काफी लोकप्रियता है. वे किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे है. बायतु से 2013 से 2018 तक विधायक रहे. 2018 में हार गए लेकिन संघ के बेहद करीबी होने की वजह से लोकसभा चुनावों में टिकट दिया. पीएम नरेंद्र मोदी ( Narendra modi ) उनके समर्थन में जनसभा करने बाड़मेर आए. जीत के बाद कैलाश चौधरी को खुद भी मंत्री बनने की चाहत नहीं थी. लेकिन पीएम मोदी ने किसानों में उनकी पकड़ पर भरोसा जताते हुए कृषि राज्यमंत्री की कमान सौंपी. केंद्र में मंत्री बनने के बाद कैलाश चौधरी की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है. कैलाश चौधऱी उन नेताओं में से है जिनकी जाटों के अलावा दूसरी जातियों में भी लोकप्रियता है.

पहला नाम- हनुमान बेनीवाल

जाट कौम में सबसे बड़ा दुख इस विषय का है कि उनका आज तक सीएम नहीं बना. कभी मौा आया भी लेकिन बन नहीं पाए. राजस्थान ( Rajasthan ) में बीजेपी और कांग्रेस में जिन जाट नेताओं ने उठने कोशिश की. उसे उनकी पार्टी ने ही खत्म कर दिया. रामेश्वर डूडी ताजा उदाहरण है. इससे पहले नागौर के मिर्धा परिवार, जोधपुर ( jodhpur ) के मदेरणा और झुंझुनूं के ओला परिवार को भी उनकी ही पार्टी ने खत्म कर दिया. ऐसे में अब राजस्थान की जाट कौम हनुमान बेनीवाल में अपना भविष्य देख रही है. बेनीवाल की सबसे बड़ी ताकत ये है कि उनकी खुद की पार्टी है. वे राजस्थान में तीसरे विकल्प के तौर पर उभर रहे है.

वसुंधरा और गहलोत दोनों के विरोधी है. पहली बार चुनाव लड़कर तीन विधानसभा सीटें जीती और करीब 30 सीटों पर बड़ी संख्या में वोट हासिल किए. हनुमान बेनीवाल नागौर से सांसद है. बीजेपी गठबंधन के साझीदार के रूप में एनडीए का हिस्सा है. 2023 के विधानसभा चुनाव में RLP अगर 30 सीटें भी जीतती है तो वो किंगमेकर बनेगी. हालांकि जाट कौम का सपना बेनीवाल को सीएम बनाने का है.

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