भारत-पाक आगरा शिखर सम्मेलन वार्ता विफल क्यों हुई थी ?

20-21 फरवरी 1999 तो जब एक तरफ अटल बिहारी वाजपेयी बस लेकर लाहोर पहुंचे. और वहां पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ उनके स्वागत में पलक पावड़े बिछाकर बैठे थे. तब उस वक्त के पाक आर्मी चीफ परवेज मुशर्रफ. हिमालय की चोटियों पर करगिल में भारत के खिलाफ साजिश रच रहे थे. कुछ वक्त बाद ही भारत पाकिस्तान के साथ युद्ध हुआ. पाकिस्तान की हार हुई. उधर मुशर्रफ ने पाकिस्तान में तख्ता पलट कर खुद सत्ता पर कब्जा कर दिया. लेकिन संयोग ही कहे. कि उसी परवेज मुशर्रफ के साथ वाजपेयी 15-16 जुलाई 2001 को आगरा शिखर सम्मेलन में वार्ता करने बैठे.

14 जुलाई 2001 को परवेज मुशर्रफ भारत पहुंचे. लेकिन ये वार्ता कामयाब नहीं हो पाई. दो दिन तक चली वार्ता आखिरकार मुशर्रफ की नापाक हरकतों की वजह से फेल हो गई. और इस वार्ता के फेल होने के पीछे कई कारण थे. हालांकि भारत और पाकिस्तान दोनों एक दूसरे को जिम्मेदार बताते रहे है.

वार्ता में शुरूआत से ही दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी थी. भारत में अटल सरकार के दौरान दो गुट थे. एक गुट हमेशा लालकृष्ण आडवाणी के पक्ष में था. तो दूसरा वाजपेयी के पक्ष में था. वाजपेयी का स्वास्थ्य खराब था. और लगातार इस बात की चर्चा होती थी उनके बाद में कौन ?

मुशर्रफ की चालाकी के बारे में खूफिया विभाग ने बताया था.

भारत के खूफिया विभाग ने इस वार्ता से पहले ही गृह मंत्रालय को सूचित किया था. कि पाकिस्तान वाजपेयी और आडवाणी के बीच टकराव बढ़ाकर फायदा उठाने की कोशिश कर सकता है. आगरा में हुई इस वार्ता में पहले तो सिर्फ वाजपेयी और मुशर्रफ के बीच ही बात हुई. लेकिन बाद में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों को शामिल किया गया. भारत की ओर से जसवंत सिंह वार्ता में शामिल हुए. एक समझौता पत्र तैयार किया गया. जिसे संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में सार्वजनिक करना था.

लेकिन इस पत्र पर भारत कैबिनेट ने मंजूरी नहीं दी. विदेश मंत्री जसवंत सिंह और आडवाणी के बीच इसको लेकर बहस हुई. आडवाणी ने कहा कि इसमें सीमा पार आतंकवाद और शिमला समझौते का जिक्र नहीं है. और इसके बिना आगे नहीं बढ़ सकते. जसवंत सिंह ने गुस्से में कहा कि आप मेरी नियत पर सवाल उठा रहे है.

प्रेस वार्ता से बिगड़ा आगरा शिखर सम्मेलन वार्ता का खेल

उधर खुद मुशर्रफ ने खेल बिगाड़ दिया. इधर वाजपेयी सरकार के दिग्गज मंत्रियों के बीच चर्चा चल रही रही थी. कि परवेज मुशर्रफ ने एक सार्वजनिक प्रेस कांफ्रेंस कर मीडिया के सामने कई ऐसी बातें बोली. जिनकी वजह से बातचीत में खटास पड़ गई. इस प्रेस वार्ता का टीवी चैनलों पर सीधा प्रसारण हुआ.

असल में मुशर्रफ इस वार्ता की सफलता चाहते भी नहीं थे. मुशर्रफ ने पाकिस्तान में नवाज शरीफ को सत्ता से हटाकर खुद कब्जा किया था. जिसके बाद दुनिया भर में उनकी तानाशाही वाली छवि बन रही थी. ऐसे में मुशर्ऱफ भारत के साथ दोस्ती का दिखावा कर खुद की स्वीकार्यता बढ़ाना चाह रहा था.

दाऊद पर अटकी आगरा शिखर सम्मेलन वार्ता

पूर्व रॉ प्रमुख एसएस दुल्‍लत ने साल 2015 में खुलासा करते हुए कहा था. कि आगरा शिखर सम्मेलन वार्ता से पहले परवेज मुशर्रफ और उप प्रधान मंत्री लालकृष्ण आडवाणी की मुलाकात हुई. इस मुलाकात में आडवाणी ने परवेज मुशर्रफ के सामने अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद को भारत को सौंपने की शर्त रखी. परवेज मुशर्रफ ये बात मानने को तैयार नहीं थे. मुशर्रफ ने सीधा कोई जवाब नहीं दिया. सिर्फ इतना कहा कि कल आगरा में बात करेंगे.

16 जुलाई को वार्ता के असफल होने पर वाजपेयी तमतमाए हुए थे. उन्हौने मुशर्रफ से हाथ मिलाया. और कमरे से बाहर निकल गए. मुशर्रफ वापिस पाकिस्तान रवाना होने वाले थे. कायदा ये था कि वाजपेयी कार तक मुशर्रफ को छोड़ने जाते. मुशर्रफ को अकेले जाना पड़ा. इससे ज्यादा और क्या बेइज्जती हो सकती थी किसी राष्ट्रपति की.

कारगिल युद्ध और आगरा वार्ता के बीच एक और मौका आया था. जब सार्क सम्मेलन में वाजपेयी और मुशर्रफ आमने सामने हुए. मुशर्रफ ने वाजपेयी से हाथ मिलाना चाहा. मुशर्रफ ने हाथ बढ़ाया. लेकिन हमेशा खुशमिजाज रहने वाले वाजपेयी की मांसपेशियां खिंच गई. साफ था कि वो हाथ नहीं मिलाना चाहते थे.

हालांकि भारत पाकिस्तान के आगरा शिखर सम्मेलन वार्ता को लेकर अलग अलग राय है. कांग्रेस समेत विरोधी पार्टियों ने इसे असफल बताया तो वहीं बीजेपी ने सफल बताया. सरकार का तर्क था कि वार्ता के जरिए हमने दुनिया में अपनी सकारात्मक छवि पेश की.

ये भी पढें-

Facebook Comments