जसवंत सिंह जसोल के साथ बीजेपी का दोहरा रवैया

जसवंत सिंह जसोल , बीजेपी के संस्थापक सदस्य, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वित्त , रक्षा और विदेश मंत्री रहे. कभी राज्यसभा से सांसद रहे तो कभी राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को हराकर जोधपुर के लोकसभा सांसद बने. 2014 में पार्टी ने टिकट नहीं दिया तो निर्दलीय चुनाव लड़ा. अपनी ही पार्टी से जंग हार गए. एक जंग अब भी लड़ रहे है. ये जंग सत्ता की नहीं, ये जंग जिंदगी की है. दिल्ली में धौला कुंआ के पास रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल में ईलाज चल रहा है. पिछले पांच साल से वो कोमा में है.

हर मुसीबत में काम आए जसवंत सिंह जसोल

जसवंत सिंह जसोल पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे. अटल सरकार में हर मुसीबत की घड़ी में मोर्चा संभाला. चाहे परमाणु परीक्षण के बाद भारत पर लगे प्रतिबंधों के बाद अमेरिका को मनाने की बात हो. चाहे ब्रिटेन से संपर्क साधना हो. चाहे एनडीए सरकार की सहयोगी जयललिता के साथ संपर्क बनाए रखने की बात हो. या कंधार विमान हाईजेक के वक्त आतंकियों की रिहाई के वक्त उनके साथ कंधार यात्रा हो. लेकिन बीजेपी और दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों ने कभी जसवंत सिंह का खुले दिल से साथ नहीं दिया.

बीजेपी के दिग्गज नेताओं में जसवंत सिंह जसोल

संघ के दबाव में नहीं चलते थे जसवंत सिंह जसोल

1998 में 13 दिन की सरकार की शपथ के वक्त अटलजी जसवंत सिंह जसोल को वित्त मंत्री बनाना चाहते थे. लेकिन संघ इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं हुआ. जसवंत सिंह उन चंद लोगों में से थे जिनकी पीएम ऑफिस में जबरदस्त पकड़ थी. लेकिन संघ को कभी ये पसंद नहीं आया. और यही वजह है कि 1966 में जसवंत सिंह ने जिस नाव को सियासत के समंदर में उतारा था. वो 2014 तक तमाम कामयाबियों के बावजूद हिचकोले खाती रही.

जिन्ना का जिन्न और जसवंत सिंह

अब मुद्दे पर आते है, इतनी लंबी भूमिका इसलिए बांधनी पड़ी ताकि आप ये समझ सके कि जसवंत सिंह संघ की कभी पसंद नहीं रहे थे. और बीजेपी के हर काम पर संघ की नजर रहती है. संघ का असर रहता है.

मोहम्मद अली जिन्ना, वो शख्स जिसने इस देश के दो टुकड़े करवाए. उस शख्स ने बीजेपी के दो कद्दावर नेताओं के सियासी करियर को भी बर्बाद किया. तो आज जिक्र दो नेता, दो किस्से, दो रवैये और संघ/बीजेपी के दोहरे व्यवहार का होगा. जसवंत सिंह जसोल की लिखी किताब – जिन्ना : इंडिया-पार्टीशन, इंडिपेंडेंस ( Jinnah: India, Partition, Independence ) 17 जून 2009 को प्रकाशित हुई.

लेकिन किताब के प्रकाशन के साथ ही बीजेपी ने जसवंत सिंह जसोल जैसे कद्दावर नेता को बिना किसी दुआ सलाम के बाहर का रास्ता दिखा दिया. और असल में इसकी आकाशवाणी एक दिन पहले ही हो चुकी थी. जब संघ के नए नए सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा था कि अब इस तरह की घटनाओं पर रोक लगाने का वक्त आ गया है.

असल में जसवंत सिंह जसोल ने अपनी किताब में जिस तरह से जिन्ना की तारीफें की थी. और उसे धर्मनिरपेक्ष दिखाने की कोशिश की. वो बीजेपी और आरएसएस के विचारों के तो खिलाफ था ही. बल्कि कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियों ने भी इस पर सवाल उठाए. वैसे किताब के बारे में हम विस्तार से बात करें उससे पहले मुद्दे की बात जरूरी है.

सवाल ये है कि जून 2005 में लालकृष्ण आडवाणी पाकिस्तान दौरे पर जाते है. जिन्नाह की मजार पर जाते है. जिन्ना की तारीफें करते है और कई बातें ऐसी बोलते है जो विवादित थी. मसलन ये कहना कि हर हिंदुस्तानी के दिल में एक पाकिस्तानी बसता है. बाबरी विध्वंस का दिन सबसे उदास दिनों में से एक था. ये वो बयान थे जो देश की राजनीति में कुछ वक्त के लिए भूचाल जरूर लाए.

आप कोई और राय बनाएं उससे पहले ये समझ लीजिए कि आखिर जसवंत सिंह की किताब में था क्या ?

जसवंत सिंह जसोल की किताब में क्या था


किताब- जिन्ना : इंडिया-पार्टीशन, इंडिपेंडेंस ( Jinnah: India, Partition, Independence )

  • इस किताब में विभाजन की कारणों की पड़ताल की गई.
  • देश के सुरक्षा खतरों के बारे में विस्तार से बताया गया.
  • आंतरिक और बाह्य सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठाए गए थे.
  • कारगिल युद्ध, कंधार विमान अपहरण और परमाणु परीक्षण के बारे में भी विस्तार से लिखा गया
  • इस किताब में कांग्रेस के शुरूआती 40 साल के कार्यकाल का जिक्र किया गया. और ये बताया गया कि कैसे कांग्रेस सरकारों ने सुरक्षा व्यवस्था की अनदेखी की.
  • जसवंत सिंह ने इस किताब में भारत की आजादी के बाद के रक्षा बदलावों का जिक्र किया था.
  • 1947 से पहले भारतीय ब्रिटिश सेना के असाधारण सैनिकों को विक्टोरिया क्रॉस के सम्मान से नवाजा जाता था. जसवंत सिंह ने उन 40 भारतीय सैनिकों के बारे में बताया.
  • इस किताब में जसवंत सिंह ने देश के उन सपूतों को सलामी दी जिन्होंने युद्ध समय में देश के सम्मान के लिए असाधारण काम किया
  • किताब में देश के विभाजन के लिए जिन्ना के साथ साथ नेहरू समेत कई भारतीय नेताओं को भी जिम्मेदार ठहराया गया.

खास क्यों थी ये किताब-

  • पूरे शोध और तथ्यों के साथ लिखी गई थी.
  • जसवंत सिंह ने बिना दूतावास की मदद के ट्रोंसोजिनिया देशों का दौरा किया. जिसमें उज्बेकिस्तान, तजाकिस्तान, दक्षिणी किर्गिस्तान और दक्षिण पूर्व कजाकिस्तान जैसे देश शामिल थे.
  • इस किताब में रक्षा क्षेत्र से जुड़ी छोटी छोटी बातों का जिक्र किया गया था
  • इसमें पड़ोसी देशों की सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति के बारे में लिखा गया था. जिसके बारे में कभी किसी नेता ने न तो लिखा और न ही रूची दिखाई.
  • मध्य एशिया की संस्कृति में रूची रखने वालों के लिए ये खास किताब है.

ऐसे में फिर वही सवाल उठता है कि जिस किताब को पूरे शोध के साथ लिखा गया हो. जिस किताब में देश की रक्षा नीति के बारे में विस्तार से बताया गया हो. जिस किताब में पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के बारे में इतना विस्तार से बताया गया हो. उस पर बीजेपी ने इतना बवाल क्यों किया. और सत्य तो ये भी है कि इस किताब में जो चीजें लिखी गई थी वो पूरे रीसर्च और तथ्यों पर आधारित थी.

ये भी पढें-

Facebook Comments