हनुमान बेनीवाल की पार्टी RLP बन रही है बीजेपी कांग्रेस की मुसीबत

राजस्थान की राजनीति हमेशा दो दलीय राजनीति रही है. बीजेपी-कांग्रेस के अलावा यहां किसी भी पार्टी को सियासी कामयाबी नहीं मिली है. भले ही प्रदेश में बसपा, सपा और माकपा जैसी पार्टियां अपना अस्तित्व रखती है लेकिन हनुमान बेनीवाल ( Hanuman Beniwal ) के नेतृत्व में आरएलपी ( राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ) पहली बार मजबूती से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है और तेजी से पार्टी का विस्तार हो रहा है.

हनुमान बेनीवाल का परिचय

हनुमान बेनीवाल ( Hanuman Beniwal ) का जन्म 2 मार्च 1972 को नागौर ( Nagaur ) जिले से 25 किलोमीटर दूर बरण गांव में हुआ. नागौर राजस्थान ( Rajasthan ) का वो इलाका है जो प्रदेश की सबसे बड़ी कौम जाट राजनीति का हमेशा से केंद्र रहा है. मिर्धा परिवार का नाम पूरे प्रदेश की राजनीति में सम्मान के साथ लिया जाता था लेकिन जैसे जैसे हनुमान बेनीवाल का कद बढ़ता गया, जाट वोटर से मिर्धा परिवार की पकड़ ढ़ीली होती गई. इनके पिता का नाम रामदेव बेनीवाल था और माता का नाम मोहनी देवी था.

पिता रामदेव बेनीवाल भी नागौर की मूंडवा सीट से विधायक रह चुके थे. 1977 के चुनाव में जब कांग्रेस ( congress )राजस्थान में बुरी तरह हार गई थी और भैरोसिंह शेखावत के नेतृत्व वाली जनता पार्टी ने 200 में से 152 सीट जीती तब भी मुंडवा सीट से हनुमान बेनीवाल के पिता रामदेव बेनीवाल मुंडवा सीट से जनता पार्टी के उम्मीदवार राम प्रकाश को 3,836 वोटों से हराने में कामयाब रहे थे

Hanuman Beniwal का चुनाव प्रचार

1978 में जब अंदरूनी कलह की वजह से कांग्रेस में विभाजन हुआ तो रामदेव बेनीवाल भी इंदिरा गांधी के गुट से अलग हो गए. 1980 में इसी सीट से रामदेव बेनीवाल को हरेंद्र मिर्धा से 8,505 वोटों हार का सामना करना पड़ा लेकिन 1985 के चुनाव में हरेंद्र मिर्धा को 3,885 वोटों से हराकर रामदेव बेनीवाल ने पुरानी हार का बदला लिया. इसके बाद 1990 और 1993 का चुनाव हारने की वजह से रामदेव बेनीवाल का सियासी करियर ढ़लान पर था लेकिन इसी बीच उनका बेटा हनुमान बेनीवाल राजस्थान यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति के जरिए सियासी शतरंज पर दांव पेंच खेल रहा था और रामदेव बेनीवाल की सियासी विरासत को अपने कंधों पर ढ़ोने का मूड बना चुका था

हनुमान बेनीवाल ( Hanuman Beniwal ) की छात्र राजनीति

हनुमान बेनीवाल ( Hanuman Beniwal ) 1994 को महाराजा कॉलेज से पहली बार छात्रसंघ अध्यक्ष बने. 1995 में दूसरी बार अध्यक्ष बने. 1996 में लॉ कॉलेज से अध्यक्ष चुने गए. 1996 में ही जेसी बॉस हॉस्टल में हुए दुष्कर्म कांड के बाद हुए आंदोलन से बेनीवाल सुर्खियों में आए. 1997 के चुनाव में हनुमान बेनीवाल निर्दलीय चुनाव लड़े और बड़े आसानी से जीत गए. अध्यक्ष बनने के बाद बेनीवाल ने ग्रामीण इलाके से आने वाले छात्रों को प्रवेश में 5 प्रतिशत अधिक अंक देने की मांग की और आखिर इसमें भी कामयाबी मिली. 5 प्रतिशत बोनस अंक मिलने की वजह से ही अगले साल 8 हजार ग्रामीण छात्रों का प्रवेश हुआ था.

रामदेव बेनीवाल के निधन के बाद संभाली विरासत

1998 के विधानसभा चुनाव में पिता रामदेव बेनीवाल ने बीजेपी प्रत्याशी के रूप में नामांकन किया लेकिन बीच चुनाव में ही 12 नवंबर 1998 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया. पार्टी नेताओं ने तय किया कि हनुमान बेनीवाल पिता की विरासत को आगे ले जाएंगे लेकिन तकनीकि कारणों से हनुमान बेनीवाल नामांकन नहीं कर पाए. 2003 के चुनाव में जब बीजेपी ने टिकट नहीं दिया तो हनुमान बेनीवाल हरियाणा की किसान पार्टी इंडीयन नेशनल लोकदल के टिकट पर लड़े लेकिन हार गए. ऊषा पूनिया, हबीबुर्रहमान और हनुमान बेनीवाल ( Hanuman Beniwal ) के बीच हुए त्रिकोणिय मुकाबले में वे 3 हजार के करीब वोटों से हार गए. बीजेपी प्रत्याशी तीसरे नंबर पर रहे.

जाट नेता बनकर उभरे हनुमान बेनीवाल ( Hanuman Beniwal )

जीवन गोदारा हत्याकांड हो या दूसरा कोई भी मौका रहा हो, हनुमान बेनीवाल जाट समाज की आवाज को हमेशा से मजबूती से उठा रहे थे यही वजह है कि मिर्धा परिवार के कमजोर होने से की वजह से हनुमान बेनीवाल नए जाट नेता के तौर पर उभरे. 2008 के परिसीमन के बाद मूंडवा सीट खत्म कर दी गई और खींवसर नाम से नई सीट आस्तित्व में आई.

हनुमान बेनीवाल ( Hanuman Beniwal ) को 2008 के विधानसभा चुनाव में खींवसर से बीजेपी की टिकट मिल गई. कांग्रेस के डॉ. सहदेव चौधरी और बीएसपी के दुर्ग सिंह चौहान के बीच हुए त्रिकोणीय मुकाबले में बेनीवाल को जीत मिली. इस चुनाव में हनुमान के खाते में गए 58,602 वोट. दूसरे स्थान पर रहे दुर्ग सिंह को 34,292 वोट मिले और कांग्रेस के सहदेव चौधरी को सिर्फ 17,124 वोट मिले. लंबे संघर्ष के बाद विधायक बनने के साथ वो अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने की ओर बढ़ चुके थे.

जब बीजेपी से अलग हुए बेनीवाल ( Hanuman Beniwal )

2008 में बीजेपी से चुनाव भले ही जीते लेकिन बेनीवाल ने वसुंधरा राजे का विरोध बंद नहीं किया और आखिरकार बीजेपी से अलग हो गए. Bjp से अलग होने के बावजूद उन्हौने कांग्रेस से नजदीकी नहीं बनाई और दोनों पार्टियों का विरोध करते रहे. 2013 के चुनाव में मोदी लहर में बीजेपी ने 200 में से 163 सीटें जीती लेकिन खींवसर से हनुमान बेनीवाल निर्दलीय बड़ी जीत हासिल करने में कामयाब रहे.

राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी का गठन

खींवसर से निर्दलीय विधायक बनने के बाद बेनीवाल ने सियासत का एक और अध्याय शुरू किया. बेनीवाल ने पूरे राजस्थान में किसान हुंकार रैलियां शुरू की. इन रैलियों में भारी भीड़ उमड़ी जिसका संदेश दिल्ली तक पहुंच रहा था, मोदी और अमित शाह ( Amit Shah ) बेनीवाल की इस बढ़ती ताकत से भली भांति वाकिफ हो रहे थे. शाह और मोदी की वसुंधरा राजे से भी अदावत थी और ऐसे में बेनीवाल मोदी-शाह का काम आसान कर रहे थे. 2018 के विधानसभा चुनावों से ठीक एक महीने पहले हनुमान बेनीवाल ने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के नाम से नई पार्टी बनाई और इतने कम समय में प्रदेश की 60 से ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे. परिणामों में तीन सीटें जीतने में कामयाब रहे.

Hanuman Beniwal Rally

इन्हीं चुनावों में बीजेपी से अलग हुए घनश्याम तिवाड़ी ने भारत वाहिनी नाम से नई पार्टी बनाई थी लेकिन वो अपनी सीट भी जीतने में कामयाब नहीं हुए थे जबकि हनुमान बेनीवाल ( Hanuman Beniwal ) ने बाड़मेर ( Barmer ) , जोधपुर ( Jodhpur ) , नागौर और बीकानेर जिलों के साथ साथ शेखावाटी में काफी वोट बटोरे थे. कई सीटों पर कड़ी टक्कर दी तो कहीं पर उनके प्रत्याशी नंबर दो पर रहे और करीब 30-35 सीटों पर बेनीवाल के प्रत्याशियों ने परिणाम तय करने में भूमिका निभाई.

मोदी-शाह ने हनुमान से हाथ मिलाया

राजस्थान में ये पहला मौका था जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में Bjp जैसी मजबूत पार्टी को लोकसभा चुनाव में RLP से गठबंधन करना पड़ा और बीजेपी को बाड़मेर से लेकर नागौर और शेखावाटी तक के पूरे जाट बेल्ट में इसका बड़ा फायदा मिला. बेनीवाल बीजेपी के साथ होने के बावजूद वसुंधरा राजे ( Vasundhara raje ) से अपनी पुरानी दुश्मनी निभा रहे है और उन पर लगातार निशाना साध रहे है. निकाय चुनाव में बीजेपी ने बेनीवाल से अलग होकर चुनाव लड़ा तो अकेले कांग्रेस ( congress ) को मात नहीं दे सकी.

हनुमान बेनीवाल का सबसे ज्यादा ध्यान मारवाड़ा और शेखावाटी में है. राजस्थान में ऐसा पहली बार हो रहा है जब कोई क्षेत्रीय पार्टी बीजेपी और कांग्रेस को टक्कर देकर तीसरे विकल्प के रूप में उभर रही है

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