जानिए- गोडसे को देशभक्त क्यों मानती है साध्वी प्रज्ञा ठाकुर

संसद में भोपाल से बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा के गोडसे पर बयान के बाद कांग्रेस समेत सभी विपक्षी पार्टियां हंगामा कर रही है. देश में एक तबका ये सवाल उठा रहा है कि साध्वी गोडसे को देशभक्त क्यों मानती है ऐसे में आज हम आपको बताएंगे कि गोडसे के प्रति इस प्रेम के लिए कौन जिम्मेदार है. क्या इसके पीछे संघ की सोच है या खुद कांग्रेस ही जिम्मेदार है और बड़ा सवाल ये भी है कि क्या नाथूराम गोडसे ( Nathuram godse ) के प्रति प्रेम रखने वालों के लिए नफरत होनी चाहिए ?

गोडसे के जघन्य पाप का कोई समर्थन नहीं कर सकता और न किसी को करना चाहिए लेकिन साध्वी वाली मानसिकता के लिए जिम्मेदार कौन है, bjp या संघ या कांग्रेस, क्या हमसे दो पीढ़ी पुराने लोग यानि जो 1947-48 में समझदार हो चुके थे, क्या वो हमसे अलग सोचते थे, क्या उस दौर के लोग गोडसे से नफरत करते थे, और क्या आज हमारी पीढ़ी के लोग गोडसे ( Nathuram godse ) को देशभक्त मानते हैं.

ये सारे सवाल आज मैं इसलिए उठा रहा हूं क्योंकि राष्ट्रवाद पर अटूट भरोसा रखने वाले लाखों-करोड़ों लोगों को ट्रोल करने के लिए “बौद्धिक आतंकवादियों” का “सिकलुर गैंग” सक्रिय हो चुका है लेकिन इन अज्ञानियों से उलझने से पहले हमें गोडसे ( Nathuram godse ) का समर्थन करने वाली मानसिकता का अध्यन करना होगा क्योंकि हर अच्छी और बुरी मानसिकता के दो पहलू होते हैं.

किसी मुद्दे की तह तक जाने के लिए सबसे पहले उस दौर को समझना बहुत ज़रुरी होता है जब वो घटना हुई हो क्योंकि देशकाल, स्थिति, परिस्थिति का अध्यन करे बिना आप किसी निष्पक्ष नतीजे पर नहीं पहुंच सकते यही वजह है कि गांधी और गोडसे के संदर्भ में हमने पहले ही ये सवाल उठाया है कि “क्या हमसे दो पीढ़ी पुराने लोग यानि जो 1947-48 में समझदार हो चुके थे, क्या वो हमसे अलग सोचते थे ?

तो आइए शुरुआत करते हैं उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों में से एक जस्टिस जी डी खोसला से करते है. जस्टिस खोसला जिन्होने नाथूराम गोडसे ( Nathuram godse ) को शिमला हाईकोर्ट मे फांसी की सज़ा सुनाई थी. अब पढ़िए जस्टिस खोसला ने अपनी किताब The Murder of the Mahatma के पेज नंबर 47 पर क्या लिखा है. उन्हौने लिखा कि “गोडसे की दलील सुनने के बाद कोर्ट में मौजूद लोग स्तब्ध और विचलित थे। एक गहरा सन्नाटा था, जब उसने बोलना बंद किया। महिलाओं की आँखों में आँसू थे और पुरुष भी सुबकते हुए रुमाल ढूँढ रहे थे। मुझे कोई संदेह नहीं है, कि यदि उस दिन अदालत में उपस्थित लोगों की ज्यूरी बनाई जाती और गोडसे पर फैसला देने कहा जाता तो भरी अदालत, भारी बहुमत से गोडसे को बाइज्जत बरी करने का फैसला दे देती।”

इसी किताब में जस्टिस खोसला ने गोडसे के बयान को हॉलीवुड का मैलोड्रामा भी कहा था. उस दौर के सबसे बड़े पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपने एक लेख में लिखा था कि शिमला हाईकोर्ट की पहली सुनवाई के दौरान जब वहां मौजूद सभ्रांत (एलिट) महिलाओं ने गोडसे को बिना स्वेटर के ठिठुरते देखा तो उन्होने उसी दिन से गोडसे के लिए स्वेटर बुनना शुरु कर दिए और बकायदा तोहफे के तौर पर उस तक पहुंचाया भी.

सोचिए जब गोडसे बयान दे रहा था तो अदालत में मौजूद महिलाएं रो रहीं थी और पुरुष सुबक रहे थे, वो जब से ठंड से ठिठुर रहा था तो औरते उसके लिए स्वेटर बुन रहीं थीं. और समझने वाली बात ये भी है कि शिमला उस वक्त वीआईपी लोगों का ठिकाना हुआ करता था. शिमला में भारत का एलिट क्लास रहता था, टॉप आईसीएस, जजेस और बड़े कारोबारियों का परिवार वहां रहता था. साध्वी प्रज्ञा तो चंबल के भिंड की रहने वाली हैं लेकिन वो क्या वजह थी कि 1948 में शिमला में रहने वाले एलिट लोग गोडसे के लिए आंसू बहा रहे थे ? हमें इसी मानसिकता को समझने की ज़रूरत है.

हम 2020 के दौर में गोडसे का समर्थन करने वालों पर संघ का ठप्पा लगा देते हैं तो फिर 1947-48 के वो कौन लोग थे जो गोडसे के लिए सहानुभूति रखते थे ? अगर आप उस दौर का अध्यन करेंगे तो पाएंगे कि पाकिस्तान से आए रिफ्यूजी से लेकर शिमला के एलिट क्लास का एक बड़ा हिस्सा गोडसे के समर्थन में खड़ा था, आखिर क्यों ? क्या इसके पीछे आरएसएस की साज़िश थी, क्या तब बीजेपी का जन्म भी हुआ था, क्या गोडसे को फांसी की सज़ा सुनाने वाले जस्टिस खोसला “संघी” थे, वो महिलाएं जो गोडसे के लिए अदालत में रो रहीं थी, क्या वो “संघी” थीं, जो औरतें गोडसे के लिए स्वेटर बुन रहीं थी, क्या वो भी “संघी” थीं?

अब अगर मुद्दे की बात करें तो हमें उन कारणों को सुलझाने की ज़रूरत है जिसकी वजह से आज भी कुछ लोग गोडसे का महिमंडन करने लगते हैं. लिहाज़ा उस दौर का सच्चा इतिहास सामने लाया जाए ताकि बापू का सम्मान भी कायम रहेगा और इस देश की एकता भी कायम रहेगी क्योंकि देश की आजादी के बाद से कांग्रेसी सरकारों ने सिर्फ एक परिवार के गांधी का गुणगान किया, बापू के असली सिद्धांतों को जनता तक पहुंचाने की बजाय बापू के नाम पर सिर्फ वोट बटोरे और नेहरू परिवार का गुणगान किया. आज अगर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर या कोई और व्यक्ति गोडसे का सम्मान करता है तो कहीं न कहीं उनके दिल में एक टीस है जो आधा इतिहास छुपाए जाने की वजह से है

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