Jammu Kashmir में परिसीमन को केंद्र सरकार ने दी हरी झंडी, क्या है परिसीमन ?

Central government gives green signal to delimitation in Jammu Kashmir, what is delimitation
Central government gives green signal to delimitation in Jammu Kashmir, what is delimitation

जम्मू-कश्मीर (Jammu Kashmir) को विशेषाधिकार देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने और राज्य के पुनर्गठन के बाद अब केंद्र सरकार राज्य में परिसीमन (Delimitation) कराना चाहती है, जिसके लिए चुनाव आयोग ने अपनी तैयारी शुरू कर दी है।

आज चुनाव आयोग ने इस मसले पर पहली बैठक की और तमाम पहलुओं पर चर्चा की, आयोग को अब इस संदर्भ में सरकार की तरफ से आधिकारिक अधिसूचना मिलने का इंतज़ार है, आपको बता दें की चुनाव आयोग के पूर्व कानूनी सलाहकार के मुताबिक परिसीमन में कम से कम 6 महीने का वक्त लगेगा।

जम्मू-कश्मीर में परिसीमन की जटिल प्रक्रिया के बारे में सुनील अरोड़ा और दोनों आयुक्तों को तमाम पहलुओं की जानकारी दी, आयोग के सामने परिसीमन में लगने वाली संभावित समयसीमा पर चर्चा हुई, दरअसल 2000-2001 में उत्तराखंड (Uttarakhand) में हुए परिसीमन का जिक्र किया गया जिसमें करीब साल भर का वक्त लग गया था. आयोग ने परिसीमन की तमाम बारीकियों और जटिलताओं को समझा है।

आपको बता दें कि चुनाव आयोग ज़मीन पर कामकाज तभी शुरू करेगा जब गृह मंत्रालय की तरफ से आधिकारिक अधिसूचना उसे भेजी जाएगी, जम्मू-कश्मीर के परिसीमन में सीटों के निर्धारण का प्रमुख मापदंड जनसंख्या और फिर ज़िलेवार जनसंख्या के आधार पर सीटों का निर्धारण किया जाएगा।

जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में सीटों की संख्या को बढ़ाकर 107 से 114 किया गया है यानी 7 सीटें बढ़ाई गई हैं, इनमें से 24 सीटें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (Pakistan Occupied Kashmir) में है, तभी तो पाकिस्तान इस मुद्दे को यूनाइटेड नेशन तक लेके गया है, इसलिए चुनाव 90 सीटों पर ही होगा जो कि अब तक 83 सीटों पर होता था.

जम्मू कश्मीर – परिसीमन के नाम पर हुए ‘खेल’ की कहानी

भारत मे इतने सारे राज्य हैं, केंद्र शासित प्रदेश हैं। क्या आपके मन मे कभी आया कि किस हिसाब से किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा और लोकसभा सीटें बनाई जाती हैं ?

ऐसा क्यों है कि हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे बड़े प्रदेशो में 4-5 लोकसभा सीटें ही हैं, जबकि दिल्ली जैसे छोटे केंद्र शासित प्रदेश में 7 सीटें हैं ? ऐसे ही और भी कई उदाहरण देखने को मिल जाएंगे, लेकिन आज का मुद्दा है जम्मू और कश्मीर।

जम्मू और कश्मीर राज्य को तीन मुख्य भागो में बांटा गया था, कश्मीर घाटी, जम्मू और लद्दाख। लेकिन अगर आप सीटों के बंटवारे को देखेंगे, तो आप चौंक जाएंगे कि ये कैसा गड़बड़ झाला किया हुआ है अभी तक कि सरकारों ने।

चलिये थोड़ा इतिहास की तरफ चलते हैं !

जम्मू और कश्मीर राज्य का संविधान 1957 में लागू किया गया था। ये संविधान 1939 के महाराजा हरि सिंह द्वारा बनाये गए ‘जम्मू कश्मीर राज्य के संविधान 1939’ पर ही आधारित था। जब आजादी के बाद महाराजा हरि सिंह ने भारतीय गणराज्य में सम्मिलित होने का निर्णय किया था, उसके बाद इसी 1939 के संविधान के अंतर्गत ही जम्मू और कश्मीर को भारतीय गणराज्य में सम्मिलित किया गया था।

लेकिन नेहरू जी के परम मित्र और अब्दुल्ला खानदान के पहले चिराग, शेख अब्दुल्ला ने एक खेल खेला और मनमाने तरीके से जम्मू को 30 सीटें दी, वहीं कश्मीर घाटी को 43 सीटें दी और सबसे बड़े इलाके लद्दाख को मात्र 2 सीटें मिली।

अब आप पूछेंगे कि आखिर ऐसा क्यों किया किया गया ?

दरअसल नेहरू जी हमेशा ही शेख अब्दुल्ला के करीबी रहे और नेहरू ने अब्दुल्ला को हमेशा ‘फ्री हैंड’ दिया है जिसका लाभ शेख अब्दुल्ला ने भरपूर तरीके से उठाया। अब आप सोचिये, जम्मू कश्मीर में कुल सीट हुई 43(कश्मीर घाटी) + 30 (जम्मू) + 2 (लद्दाख) = 75

बहुमत की सरकार बनाने के लिए चाहिए 38 सीटें, तो जो पार्टी कश्मीर घाटी में 43 सीटें जीत जाएगी, वो हमेशा ही राज करेगी और किया भी, शेख अब्दुल्ला ने जम्मू कश्मीर पर एकछत्र राज किया तभी तो नेहरू ने उन्हें जम्मू कश्मीर का प्रधानमंत्री भी बनाया। जी हाँ, 1953 तक जम्मू कश्मीर में मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री ही कहा जाता था, इसे आप नेहरू जी की प्यार की पॉलिटिक्स भी कह सकते है।

आपको ये जानकर झटका भी लग सकता है, की वो नेहरू ही थे जिन्होंने अब्दुल्ला को पाकिस्तान भेजा था, शांति की बात करने के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच mediator बनने के लिए कहा। बीच बीच मे नेहरू-गांधी परिवार के अब्दुल्ला से संबंध बिगड़ भी गए, और अब्दुल्ला को जेल में भी डाला गया।

लेकिन फिर 1974 में इंदिरा गांधी और अब्दुल्ला के बीच Indira-Sheikh accord हुआ, और अब्दुल्ला को फिर से मुख्यमंत्री बनाया गया, फिर उनके बेटे फारूख अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने और फिर अब्दुल्ला और मुफ़्ती के बीच कश्मीर के सिंहासन की बंदरबांट चलती रही, जिसे अब जाकर मोदी सरकार ने ख़त्म किया है।

मुद्दे पर वापस आते हैं, 2011 के census के अनुसार जम्मू डिवीज़न की जनसंख्या 53,78,538 है और जम्मू पूरे राज्य का 25.93% भाग है और पूरे राज्य की 42.89% जनसंख्या जम्मू डिवीज़न में रहती है। कश्मीर डिवीज़न की जनसंख्या है 68,88,475, जिसमे 96.40% मुस्लिम आबादी है। कश्मीर डिवीज़न पूरे राज्य का मात्र 15.73% भाग है, वहीं इसमे जनसंख्या है 54.93%।

वहीं लद्दाख डिवीज़न पूरे राज्य का 58.33% इलाका है, और जनसंख्या के हिसाब से लद्दाख में पूरे राज्य की 2.18% जनसंख्या रहती है। अभी के आंकड़ों के हिसाब से, कश्मीर डिवीज़न को 46 सीट्स मिली हुई है, जम्मू को 37 और लद्दाख को मात्र 4।

अब आप स्वयं सोचिये, कोई भी पोलिटिकल पार्टी अगर कश्मीर डिवीज़न (कश्मीर घाटी) में सभी सीटें जीत ले, तो वो पूरे राज्य पर शासन करती रहेगी, आज़ादी के बाद यही गलत परिसीमन ही तो सबसे बड़ा कारण है कि कश्मीर घाटी के 2 परिवार ही हमेशा पूरे राज्य पर एकछत्र राज करते आये हैं। कांग्रेस (जो स्वयं एक परिवार की प्राइवेट पार्टी है) ने हमेशा इन्ही दोनों परिवारों से मिलजुल कर सरकारें बनाई हैं।

आखिरी परिसीमन कब हुआ ?

लेकिन 2005 से पहले पता है क्या हुआ ? 2002 में फारूख अब्दुल्ला सरकार ने परिसीमन को 2026 तक के लिए Freeze कर दिया था अब्दुल्ला सरकार ने जम्मू कश्मीर Representation of the People act और जम्मू कश्मीर के संविधान की धारा 47(3) को amend किया, और ये जोड़ दिया कि ” जब तक 2026 के जनसंख्या के आंकड़े नही आएंगे, तब तक जम्मू और कश्मीर में विधानसभा सीट्स की संख्या और उनके परिसीमन के बारे में कोई कदम नही उठाया जाएगा।

जबकि अगला census होगा 2021 में, और उसके बाद अगला होगा 2031 में तो एक तरह से देखा जाए तो, फारूख अब्दुल्ला सरकार ने 2031 तक परिसीमन (delimitation) को असंभव सा ही बना दिया था और तब तक उनका पोता या पोती मुख्यमंत्री बनने के लायक हो ही जाते, तभी तो कांग्रेस के सभी नेताओं ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 और 35A हटाने का विरोध किया था, वैसे अभी भी कांग्रेस का ये विरोध जारी है लेकिन अब कोई फायदा नहीं है, लेकिन जनता को अब और अच्छे से ये बात समझ आ गई होगी की आखिर इसमें कांग्रेस का इतनी मिर्ची क्यों लगी !

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