कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र के पिटारे से निकला (AFSPA ) का जीन : जिससे सियासत में उबाल

2019 लोकसभा चुनाव में कश्मीर का मुद्दा फिर से सुलगने लगा है ऐसे बीते कुछ सालो में कश्मीर के मुद्दे को हर चुनावो में उछाला गया है। कश्मीर की समस्या को राष्ट्रवाद का मुद्दा बनाकर कुछ राजनितिक पार्टिया चुनावो में खूब इस्तेमाल कर रही है ,लेकिन आज भी कश्मीर की समस्या का कोई मूलभूत समाधान नहीं निकला है। आपको बता दे की कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र से कश्मीर के तरफ सबका ध्यान खींच लिया है।

कश्मीर पर कांग्रेस का घोषणापत्र
कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र पत्र वादा किया की अगर केन्द्र में कांग्रेस की सरकार आती है तो हम कश्मीर में अफस्पा की समीक्षा करेगी . और साथ ही देश द्रोह और मानहानि कानून को भी लेकर बात की है। अफस्पा की बात आते ही सब नजरिये से देखने लगे किसी को यह लगता है की इस हटाने से सेना का मनोबल कम हो जायेगा। लेकिन कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र कही भी इसे हटाने की बात नहीं कही है।

 

आखिर अफस्पा क्या है ?
आपके जेहन में एक सवाल आ रहा होगा की आख़िर अफस्पा क्या है ? आख़िर कश्मीर में अफस्पा को लेकर ऐसा क्या है जिसे कांग्रेस ने घोषणापत्र समीक्षा की बात कही। कश्मीर में अफस्पा 1990 में लागू हुआ ,उस समय कश्मीर में गवर्नर जी सी सक्सेना और केन्द में कांग्रेस की सरकार थी। 1960 के दशक के करीब पूर्वात्तर में उग्रवाद अपने चरम सीमा पर था और 1958 में अफस्पा कानून लागू हुआ। नागालैंड , मणिपुर , मिज़ोरम,असम ,अरुणचल प्रदेश में उग्रवाद से निपटने के लिए अफस्पा लागू किया गया था । जिस भी राज्य में हिंसा की घटना ज्यादा होती है तो उसे मोस्ट डिसट्रब एरिया घोषित करके अफस्पा कानून लागू किया जा सकता है लेकिन केंद्र और राज्य दोनों की आपसी सहमित होना जरुरी है। अफस्पा कानून लागू होने के बाद आर्म्ड फाॅर्स बिना किसी के अनुमति के किसी के भी घर में तलाशी कर सकती है और मात्र शक के आधार पर किसी का घर भी उड़ा सकती है। किसी भी नागरिक को गिरफ़्तार और कस्टडी में लेकर पूछताछ के लिए किसी मजिस्ट्रेट या कोर्ट की अनुमति लेने की जरुरत नही होती है। अफस्पा कानून लागू होने के बाद आर्म्ड फाॅर्स पर आसानी से कोई करवाई नहीं हो सकता है।

 

कश्मीर में क्यों होते है अफस्पा के विरोध
कश्मीर में अफस्पा लागू होने के बाद ही इसका विरोध होना शुरू हो गया था . कश्मीर ही नहीं बल्कि पूर्वात्तर में भी इसको काफी विरोध हुआ । सामाजिक कार्यकर्ता इनरोम शर्मीला ने इसे लेकर त्रिपुरा में 15 साल तक अनशन की थी हालांकि 2016 त्रिपुरा में अफस्पा हटा दिया गया। अफस्पा को लेकर कश्मीर में कई बार शट डाउन और हिंसा की घटनाए भी हुई। कश्मीर का सबसे फेक चर्चित एन्काउंटर माचिल जिसमे तीन कश्मीरी युवक की हत्या हुई थी और इसका आरोप इंडियन आर्मी पर लगा। कश्मीर में 1990 से लेकर भी इंसर्जेन्सी में करीबन 100000 लाख कश्मीरी  नागरिक मारे गए है और 20000 महिलाओ के रेप हुए है और कई हज़ार मिसिंग केस हुए।

अब आगे देखना होगा की केंद्र में अगर कांग्रेस आती है तो अफस्पा की समीक्षा कैसे करेगी और आतंकवाद से किस तरीके से निपटेगी ??

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