बंगला मोह और समाजवाद!!!

अखिलेश यादव का वह सरकारी बंगला खबरों में है, जिसे उन्होंने तब बनवाया था, जब वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और उन्हें आभास हो चला था कि अब उन्हें अगले चुनाव में जनता मुख्यमंत्री के बंगले से बाहर कर देगी। इसलिए उन्होंने भविष्य का घर खुद ही चुन लिया और उसे पूरी ताकत से सजाया। इतनी ताकत से कि जब वो रहने आए , तब तक 42 करोड़ रूपये बंगले को उनके लायक बनाने में लग चुके थे। सुप्रीमकोर्ट का डंडा चला तो सारे पूर्व मुख्यमंत्रियों ने तो अपने अपने बंगले छोड़ दिए। बस मायावती को छोड़कर। माया ने अपने बंगले को कांशीराम स्मृति न्यास बना डाला। अब ले लीजिए आप बंगला।

अखिलेश ने बंगला तो छोड़ दिया, लेकिन उसकी जो दुर्दशा की वो टीवी चैनलों पर दिख रही है। अब वो एक खास नौकरशाह पर बरस रहे हैं। नाम ले-लेकर कह रहे हैं कि वो नौकरशाह तो मेरे जूठे कप-प्लेट उठाता था। यहां मेरी आपत्ति है। अगर वो नौकरशाह आपके जूठे कप उठाता था, तो आप उठवाते ही क्यों थे। आप तो समाजवाद के वट वृक्ष से निकली शाख हैं, आप उन अफसरों से अपनी जूठी प्लेट उठवाते क्यों थे। इन सब के लिए आपके पास नौकर-चाकर होंगे। वो क्या करते थे अगर अफसर उनका काम करते थे ? क्या ये सामंतवाद नहीं है, जिसके उन्मूलन के लिए लोहिया जैसे समाजवादियों ने देशव्यापी मुहिम चलाई ? उसी समाजवाद के झंडे के नीचे एक पूर्व मुख्यमंत्री अपने बंगले पर 42 करोड़ का खर्चा करता है और दावा करता है कि वह सब सामान मेरा था इसलिए मैं उखाड़ कर ले गया।

दूसरी बात। राज्य संपत्ति विभाग के पास 42 करोड़ रूपए का खर्चा दिखाया गया है, जो इसी बंगले पर हुआ है। अगर अखिलेश का दावा है कि वो 42 करोड़ उन्होंने अपनी जेब से दिए हैं तो वो बताएं कि इतना पैसा कहां से आया। अखिलेश ने बयान में अफसरों को धमकी दी है कि सरकारें आती जाती रहती हैं। यानी अफसरों…खबरदार…कल को अगर उनकी सरकार वापस आती है, तो आपका क्या होगा अंदाजा लगाया जा सकता है।

बंगले को लेकर मोह ने अखिलेश से क्या-क्या करवा डाला। क्या अखिलेश ने अपने बंगले में तोड़-फोड़ इसलिए की कि वो चाहते थे कि उनकी शानो शौकत दुनिया को न दिख जाए। लोग कहीं समाजवाद की बात कर उन्हें ताना न दें।

ध्यान रहे ये वही पार्टी है जिसने राम मनोहर लोहिया का नाम ले-लेकर चुनावी राजनीति में शुरुआत तो की। लेकिन उनकी जीवन शैली लोहिया से बिलकुल अलग है। राजनीति में इस तरह के धोखे ज़्यादा दिन नहीं चलते। बिहार में यादवराज का हश्र सबने देखा। उम्मीद करें कि यूपी में भी इस तरह के नेताओं को गद्दी देने से जनता बाज़ आए।

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