Home कारोबार आखिर इस वजह से, खादी उद्योग ने खोई लाखों नौकरियां

आखिर इस वजह से, खादी उद्योग ने खोई लाखों नौकरियां

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प्राचीनकाल से खादी का अपना ही महत्व लोगों के समक्ष बना हुआ है ज्ञात हो खादी या खद्दर भारत में हाथ से बनने वाले वस्त्रों को कहते हैं। खादी वस्त्र सूती, रेशम, या ऊन हो सकते हैं। इनके लिये बनने वाला सूत चरखे की सहायता से बनाया जाता है।खादी वस्त्रों की विशेषता है कि ये शरीर को गर्मी में ठण्डे और सर्दी में गरम रखते हैं।भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में खादी का बहुत महत्व रहा।

क्या खादी उद्योग में लोग तेजी से नौकरी छोड़ रहे हैं? अगर आधिकारिक डेटा को देखें तो ऐसा ही मालूम होता है। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग मंत्रालय की ओर से लोकसभा में उपलब्ध कराए गए हालिया तथ्यों के अनुसार खादी क्षेत्र में 2015-16 और 2016-17 के बीच रोजगार घटकर 11.6 लाख से 4.6 लाख तक हो गया। यानी करीब 7 लाख लोगों ने नौकरी छोड़ दी या उन्हें नौकरी से हटा दिया गया।

बता दें इस रिपोर्ट पर नजदीकी नजर रखने वाले लोगों के लिए ये महज आंकड़ें मालूम होते हैं लेकिन इसके पीछे असली वजह क्या है या फिर आधुनिकीकरण की वजह से कितनी नौकरियां गई हैं यह अभी स्पष्ट नहीं है। आश्चर्य की बात यह है कि एक ओर जहां नौकरी में गिरावट दर्ज की गई वहीं 2015-16 से 2016-17 में खादी का प्रॉडक्शन 31.6 फीसदी और सेल 33 फीसदी तक बढ़ गई है।

जानकारी के मुताबिक खादी एवं ग्रामीण उद्योग कमिटी (केवाईआईसी) के अनुसार 2015-16 तक रोजगार की संख्या असली तस्वीर नहीं दिखाती है। हालांकि केवाईआईसी ने स्वीकार किया है कि चरखों के नए मॉडल का इस्तेमाल में लाया जाना नौकरी में गिरावट का एक कारण हो सकता है। कमिशन की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, ज्यादातर सूत कातने वाले एकल धुरी वाले पारंपरिक चरखों पर काम करते थे जिसमें ज्यादा मैनपॉवर की जरूरत होती थी। चरखों के नए मॉडल आने से कई पुराने कारीगरों को बाहर का रास्ता देखना पड़ा। हालांकि न ही मंत्रालय और न ही कमिशन ने ये स्प्ष्ट किया है कि इस वजह से कितनी नौकरियां गई हैं।

गौरतलब है 6.8 लाख में से 3.2 लाख नौकरियां तो सेंट्रल जोन यानी- उत्तराखंड, यूपी, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में खत्म हो गईं। वहीं करीब 1.2 लाख नौकरियां बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और अंडमान-निकोबार में। प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के तहत भी 2017-18 में रोजगार निर्माण में गिरावट आई है। लोकसभा में उपलब्ध कराए गए डेटा के अनुसार, 2015-16 में इस कार्यक्रम के तहत तकरीबन 3.2 लाख लोगों को नौकरी मिली। यह आंकड़ा 2016-17 में बढ़कर 4.1 लाख हो गया जबकि 2017-18 के पहले 10 महीनों में केवल 2.5 लाख नए लोगों ही इस क्षेत्र से जुड़े।

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