Home बिहार नीतीश का छलका दर्द, कर सकते है एनडीए को बाय-बाय

नीतीश का छलका दर्द, कर सकते है एनडीए को बाय-बाय

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अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए एनडीए को एकजुट रखना सबसे बड़ी चुनौती है। चुनाव से ठीक पहले एनडीए के कई सहयोगी दल खुद को असहज महसूस कर रहे हैं और रिश्तों में तल्खी लगातार उजागर हो रही है।

दरअसल, शिवसेना, तेलुगू देशम पार्टी, रालोसपा, हम और नीतीश कुमार की नाराजगी साफ तौर पर दिखने लगी है। बिहार में NDA की चार सहयोगी पार्टियां हैं। लोक जनशक्ति पार्टी को छोड़ बाकी तीन पार्टी राजग में असहज नहीं है। तीनों पार्टी के नेताओं की बयानबाजी से NDA के सामने धर्म संकट जैसी स्थिति हो गई है। जीतन राम मांझी के नेतृत्व वाली पार्टी हम, उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व वाली पार्टी रालोसपा और नीतीश कुमार की पार्टी जदयू किसी न किसी कारण से राजग में संतुष्ट नहीं हैं।उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी की नाराजगी जगजाहिर है। मांझी कई बार यह कह चुके हैं कि NDA में उनकी पार्टी उपेक्षित महसूस कर रही है। उपेंद्र कुशवाहा भी लालू प्रसाद से नजदीकियां बढ़ा चुके हैं। ऐसे में नीतीश कुमार की बयानबाजी से भी एनडीए पशोपेश में है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हाल के दिनों में गठबंधन की राजनीति में माहिर खिलाड़ी साबित हुए हैं। नीतीश कुमार के शर्तों पर जब तक सरकार चलती है तब तक गठबंधन चलती है, लेकिन जैसे ही उनके शर्तों में कोई रोड़ा अटकाने का काम करता है, तो गठबंधन की तिलांजलि दे दी जाती है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी को महज छह महीने के लिए मुख्यमंत्री बनाया था और उम्मीद की गई थी कि मांझी मुख्यमंत्री के कहे अनुसार चलेंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और महज आठ महीने में मांझी को बेआबरू होकर कुर्सी छोड़नी पड़ी। मांझी प्रकरण के दौरान नीतीश कुमार की लालू यादव से नजदीकियां बढ़ी। शरद यादव ने लालू और नीतीश कुमार के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई और बिहार में महागठबंधन की सरकार अस्तित्व में आई।

नीतीश कुमार ने इस बात का खुलासा किया कि महागठबंधन डेढ़ साल के लिए ही अस्तित्व में आया था। मुख्यमंत्री की योजना के मुताबिक, महागठबंधन तय समय सीमा से ज्यादा चला। मसलन 20 महीने तक महागठबंधन की सरकार चली। नीतीश कुमार ने कहा कि मैंने पहले ही अपने सहयोगियों से कह दिया था कि महागठबंधन डेढ़ साल से ज्यादा चलने वाला नहीं है।

नीतीश कुमार एनडीए में खुद को सहज महसूस नहीं कर रहे हैं। सूत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक, लोकसभा चुनाव के दौरान नीतीश कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। दरअसल, नीतीश कुमार की नाराजगी कई बातों को लेकर है, राजग में आने को लेकर नीतीश कुमार के मन में कई तरह की आशाएं थी। नीतीश कुमार को एनडीए का कन्वेनर बनाया जाना था।

पार्टी से दो लोगों को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कराए जाने को लेकर जदयू की तरफ से दबाव था, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हो पाया। इसके अलावा बाढ़ राहत को लेकर राज्य सरकार ने जो पैकेज के लिए प्रस्ताव भेजे थे उस पर भी अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं हो पाया है। उप चुनाव में भी जदयू के लिए एक भी सीट नहीं छोड़े जाने पर पार्टी के अंदर नाराजगी है।

लोकसभा चुनाव के दौरान सीटों के बंटवारे को लेकर नीतीश कुमार अड़ियल रवैया अपना सकते हैं। नाराज नीतीश कुमार ने उप चुनाव के प्रचार में जाने पर भी ठोस जवाब नहीं दिया। लोक संवाद कार्यक्रम के दौरान नीतीश कुमार ने सुशील मोदी के करीब में बैठे होने के बावजूद यह कहने में गुरेज नहीं किया कि वह राजग के नेता नहीं हैं, वह सिर्फ सरकार के मुखिया हैं।

नीतीश कुमार ने केंद्र की राजनीति में जाने की अटकलों पर विराम लगा दिया। ऐसी चर्चा है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व यह चाहता है कि नीतीश कुमार केंद्र की राजनीति में आएं, क्योंकि देश को उनकी जरूरत है, लेकिन नीतीश कुमार ने दो टूक कह दिया कि बिहार छोड़ने के बाद वह आश्रम चले जाएंगे। सोमवार को लोक संवाद कार्यक्रम के दौरान नीतीश कुमार ने कहा कि बिहार की सेवा भी देश की ही सेवा है और मैं बिहार में ही रहकर देश की सेवा करना पसंद करूंगा।

डेढ़ साल के लिए महागठबंधन बनाने की बात पर राजद नेता भाई वीरेंद्र ने नीतीश कुमार पर निशाना साधते हुए कहा कि नीतीश कुमार का सब से कोई वास्ता नहीं है और वह सुविधा की राजनीति करते हैं। किसके साथ कितने दिन वह रहेंगे यह किसी को पता नहीं है, सिर्फ वहीं जानते हैं।

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